हिंदी माता को करें, काका कवि डंडौत। 
बूढ़ी दासी संस्कृत, भाषाओं का स्रोत। भाषाओं का स्रोत कि ‘बारह बहुएं’ जिसकी। आंख मिला पाए उससे, हिम्मत है किसकी ?
ईष्र्या करके ब्रिटेन ने इक दासी भेजी, सब बहुओं के सिर पर चढ़ बैठी अंग्रेजी। 

हिंदी के प्रति काका का ये प्रेम इन लाइनों में साफ झलकता है। हास्य महर्षि पद्मश्री काका हाथरसी ने हिंदी के उत्थान के लिए कई रचनाएं लिखीं, लेकिन आज उन्हीं काका के बारे में यदि कोई शोद्यार्थी, विद्यार्थी अधिक जानकारी करना चाहे तो इस शहर में कोई ऐसा स्थान नहीं जहां एक छत के नीचे हास्य के इस पुरोधा के बारे में विस्तृत जानकारियां मिल सकें। ले देकर मुरसान गेट यानि काकी मार्ग स्थित काका हाथरसी स्मारक भवन है। यह भी खाली पड़ा है। अक्सर यहां शादी विवाह या अन्य आयोजन होते दिखते हैं। बुधवार को काका की जयंती पर एक बार फिर उन्हें याद किया जाएगा लेकिन जरूरत यादों को सहेजने और उन्हें अगली पीढ़ी तक बेहतर तरीके से पहुंचाने की भी है।

पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस। हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस। जाओ बेटे रूस, भली आई आजादी। इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बांदी। हास्य पुरोधा प्रभूलाल गर्ग उर्फ काका हाथरसी ने हिंदी को महान बताते हुए अंग्रेजी की उससे तुलना करते हुए कई रचनाएं लिखीं। 18 सितंबर को जन्म व अवसान दिवस है। एक बार फिर से काका हाथरसी स्मारक में चंद लोग जुटेंगे, काका की कुछ रचनाओं को पढ़ा जाएगा, और एक साल के हास्य की गंगा प्रवाहित करने वाले काका को फिर लोग भूल जाएंगे। शहर के लोग कहते हैं कि काका हाथरसी स्मारक में काका से जुड़ी स्मृतियों को सहेजकर रखा जा सकता है। उनकी तमाम किताबों, रचनाओं को यहां रखा जाए ताकि कोई भी शोध करने वाले से लेकर आम व्यक्ति काका के बारे में अधिक जानकारी आसानी से जुटा सके। आज यहां के लोगों की सामाजिक संस्थाओं व काका से जुड़े रहे साहित्यकार या प्रियजनों से उम्मीद है काका के बारे में एक संग्रहालय यहां जरूर हो। ऐसे में काका की एक कविता जरूर याद आती है। पड़ा पड़ा क्या कर रहा, रे मूरख नादान, दर्पण रखकर सामने, निज स्वरूप पहचान।

फिल्म निर्माण में काका
काका हाथरसी ने फिल्म जमुना किनारे फिल्म का निर्माण भी किया। हालांकि यह फिल्म रिलीज न हो सकी। काका ने इसमें एक उस्ताद का अभिनय किया था। काका हास्य को पूर्णता दिलाने वाले थे। उन्होंने हास्य को जन जन तक पहुंचाया। 

काका हाथरसी 
जन्म : 18 सितंबर 1906
अवसान : 18 सितंबर 1995
पूरा नाम : प्रभूलाल गर्ग।

काका की खास बात
काका की पहचान, उनकी दाढ़ी। 
मृत्यु वाले दिन श्मशान में हुआ कवि सम्मेलन। 
संगीत के जानकार, चित्रकार भी थे। 
पहली पुस्तक काका की कचहरी 1946 में प्रकाशित। 
1985 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित। 
संगीत की मासिक Metro City Samachar का संपादन किया। 
अमेरिका में 1989 में अमेरिका में ऑनरेरी सिटीजन सम्मान। 

प्रमुख कृतियां : काका के प्रहसन। काकादूत। हंसगुल्ले, काका के कारतूस। 
कविता संग्रह :  काका की फुलझड़ियां। काका तरंग। जय बोलो बेईमान की। यार सप्तक। काका के व्यंग्य बाण। 
रचनाएं : पुलिस महिमा। सुरा समर्थन। हिंदी की दुर्दशा। स्त्रीलिंग, पुल्लिंग। भ्रष्टाचार। मोटी पत्नी। दहेज की बारात। 

काका हाथरसी के नाम से पुरस्कार
हर साल काका हाथरसी पुरस्कार ट्रस्ट प्रतिवर्ष एक कवि को काका हाथरसी पुरस्कार से सम्मानित करता है। देश के प्रख्यात हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा, व्यंग्यकार अशोक चक्रधर, हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेन्द्र दुबे,डॉ.सरोजनी प्रीतम, व्यंग्यकार राकेश शरद, मधुप पाण्डे, तेजनारायण शर्मा बेचैन आदि को पुरस्कार मिल चुका है। 

आज स्मारक में समारोह
काका हाथरसी स्मारक में बुधवार को दोपहर एक बजे से समारोह होगा। साहित्यकार गोपाल चतुर्वेदी व विद्यासागर विकल ने लोगों से कार्यक्रम में पहुंचने की अपील की है। 

काका हमारे क्षेत्र की रौनक थे। हमारा क्षेत्र आज भी उनके नाम से जाना जाता है। हर हास्य का कवि जिसको काका हाथरसी सम्मान न मिले तो उसकी पहचान नहीं होती। हर हास्य के कवि की काका हाथरसी सम्मान से पहचान है। ऐसी विभूति को मेरा बार बार प्रणाम है। ऐसी विभूतियों से हमारा जिला सम्पन्न होता रहे, ऐसी प्रभु से कामना है। विनम्र श्रद्धांजलि करता हूं। – डॉ. विष्णु सक्सेना, यशभारती