Election Results 2018: के चंद्रशेखर राव कैसे बने साउथ इंडिया के नए बाहुबली!



इसी साल मई-जून में जब देश भर के हिंदी-अंग्रेजी के अखबारों में तेलंगाना सरकार के के पूरे पन्ने के विज्ञापन छपना शुरू हुआ तो लोगों को बड़ा ताज्जुब हुआ. राज्य के मुख्यमंत्री की तस्वीर के साथ सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति यानी टीआरएस की सरकार की उपलब्धियों का बखान करने वाले उन विज्ञापनों ने हर किसी का ध्यान खींचा था.

इन विज्ञापनों को देखर लोगों को को अचरज तो जरूर हुआ होगा लेकिन शायद ही किसी ने यह अंदाजा लगाया होगा कि ये विज्ञापन राज्य के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव की उस रणनीति का हिस्सा हैं जिसने उन्हें विंध्याचल के पार के भारत यानी दक्षिण भारत का नया क्षत्रप या अगर फिल्मी भाषा में कहें तो नया बाहुबली बना दिया है.

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11 दिसंबर को पांच राज्यों के असेंबली इलेक्शन के नतीजों में बाकी राज्यों की तस्वीर साफ होने को काफी वक्त लगा लेकिन तेलंगाना में केसीआर की पार्टी ने  अपनी बादशाहत को दोपहर 12 बजे तक ही कायम कर लिया. 119  सदस्यों की विधानसभा में टीआरएस ने 90 के करीब सीटें जीत कर सबको चौंका दिया. केसीआर की यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि इस बार उन्हें चुनाव हराने के लिए महागठबंधन बनाया गया गया था. तेलंगाना में इसे महाकूटामि का नाम दिया गया और इसमें राजनीति के धुर विरोधी यानी तेलगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायुडू और कांग्रेस एक साथ थे. इनके अलावा सीपीआई और तेलंगाना जनसमिति भी इसमें शामिल थी. लेकिन हुआ वही जो केसीआर ने सोचा था.

केसीआर ने इस जीत के साथ खुद को साउथ इंडिया के उन दिग्गज नेताओ की कतार में शामिल शामिल करा लिया जो जिनकी पॉपुलरिटी के किस्सों को भारतीय राजनीति के इतिहास में अहम जगह हासिल है.

कांग्रेस को उसी के गेम में दी मात!

तेलंगाना में केसीआर की यह बड़ी इसलिए भी अहम क्यों इस चुनावी रण में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की मात दी है. उस कांग्रेस को जिसमें इस राज्य का गठन करने के लिए बहुत बड़ा दांव खेला था .

उत्तर भारत के तीनों राज्यों में कांग्रेस पार्टी ने कामयाबी तो हासिल की है लेकिन तेलंगाना में केसीआर ने इस पार्टी को जो झटका दिया उसे काग्रेस की लीडरशिप के लिए पचाना मुश्किल होगा.

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केन्द्र की यूपीए सरकार के आखिरी साल 2014 में साउथ इंडिया में अपने सबसे मजबूत किले यानी आंध्र प्रदेश को दो हिस्सों में बांट कर कांग्रेस ने जो जुआ खेला था वह पांच साल बाद भी उसके काम नहीं आया. इस राज्य का बंटवारा करके काग्रेस को उम्मीद रही थी तेलंगाना में वह उसके पैर उखाड़ना किसी भी पार्टी के लिए मुमकिन नहीं होगा लेकिन केसीआर के दांव के सामने कांग्रेस पार्टी के सारे धुरंधर चित हो गए.

साल 2104 में नए तेलंगाना राज्य में सत्ता के दो दावेदाऱ थे. नया राज्य बनाने वाले कांग्रेस और उस राज्य की मांग में भूख हड़ताल लकरने वाले केसीआर. साल 2014 में ने तेलंगाना राज्य का पहला चुनाव हुआ तो केसीआर ने अपने पक्ष में पैदा हुई सहानुभूति को भरपूर तरीके से भुनाया.

अंकगणित के फेर में केमिस्ट्री भूल गई कांग्रेस

कांग्रेस को उम्मीद रही होगी कि कम से कम इस चुनाव में वह केसीआर को मात देने में कामयाब रहेगी लेकिन इस बार  केसीआर के मास्टर स्ट्रोक के सामने कांग्रेस फेल हो गई. 2014 की सहानुभूति लहर से भी ज्यादा वोट इस बार केसीआर ने हासिल किए. साल 2104 में उनकी पार्टी को 63 सीटें और 34 फीसदी वोट ही मिले थे. अलग-अलग लड़ने वाली कांग्रेस और टीडीपी को कुल 40 फीसदी वोट हासिल हुए थे. कांग्रेस को लगा कि वोटों का ये अंकगणित तेलंगाना में उनकी नैया परा  लगा देगा लेकिन केसीआर ने इस मसले को चुनाव में इस कदर भुनाया कि कांग्रेस और टीडीपी की केमिस्ट्री बैकफायर कर गई.

Chandrababu Naidu-Ashok Gehlot

कांग्रेस ने 90 सीटों पर चुनाव लड़ा और टीडीपी ने बस 17 सीटों पर. लेकिन कांग्रेस मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा पेश नहीं कर सकी और इस गठबंधन का चेहरा आंद्र प्रदेश के सीएम नायडू बन गए. केसीआर ने चुनाव में टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू को तेलंगाना विरोधी करार देते हुए हर रैली में उन्हीं के खिलाफ निशाना साधा. यानी दुश्मन नंबर वन चंद्रबाबू नायुडू बन गए. जाहिर है पांच साल पहले ही हुए राज्य के बंटवारे में चंद्रबाबू नायडू की विभाजन विरोधी छवि कांग्रेस पर भारी पड़ गई.

इसके अलावा छह महीने पहले ही असेंबली को भंग करना, एससी-एसटी मतदाताओं का कांग्रेस से छिटकना केसीआर की जीत की बड़ी वजहें रहीं. इसके अलावा किसानों के लिए 24 घंटे बिजली जैसी य़ोजनाओं ने केसीआर को ओबीसी मतदाताओं में भी पॉपुलर बना दिया.

बहरहाल कांग्रेस जिन भावनाओं के सहारे सूबे की सत्ता को हासिल करने का ख्वाब देख रही थी, केसीआर ने उन्हीं भावनाओं के सहारे उसे मात दे दी.

केसीआर को जानने वाले कहते हैं कि उनका महत्वाकांक्षाएं काफी बड़ी हैं. माना जाता है कि वह केंद्र की राजनीति में भी भूमिका निभाना चाहते हैं. हालंकि साउथ इंडिया के क्षत्रप दिल्ली की राजनीति से दूर ही रहते हैं लेकिन तेलंगाना में दो-तिहाई बहुमत की जीत ने केसीआर को इतनी शक्ति दे दी है कि वह केंद्रीय राजनीति में भी अपने कदम जमा सकते हैं.





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