हरियाणा मे लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी के संगठनात्मक कार्यप्रणाली का यदि किसी को लाभ मिलता दिखा तो वह सियासी दल रहा भारतीय जनता पार्टी। भाजपा को छोड़कर अन्य सभी दलों की संगठनात्मक कमजोरी ही उनकी नैय्या डुबो गई।
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चुनाव में हरियाणा में भाजपा के संगठन को छोड़कर अन्य दलों के संगठन की कार्यप्रणाली न तो प्रभावशाली दिखाई दी और न ही ज्यादा सक्रिय। जिस वजह से न तो दलो का मैनेजमेंट ठीक से हो पाई और न ही दलों का प्रचार तंत्र अपेक्षाकृत प्रभावशाली रही। नतीजतन हरियाणा के अधिकतर सियासी दलों को हार झेलनी पड़ी।

भाजपा ने इस लोकसभा चुनाव को लड़ने के लिए हरियाणा में पूरी तरह से संगठनात्मक रूप से भी रणनीति तैयार की थी। पहली बार भाजपा की बूथ मैनेजमेंट से लेकर पन्ना प्रमुख मैनेजमेंट भी देखने को मिली। एक पन्ना प्रमुख को अपने-अपने इलाके की 60 मतदाताओं की जिम्मेदारी दी गई थी। पन्ना प्रमुख को ये सुनिश्चित करना था कि उनके पन्ने में शामिल 60 मतदाता हरियाणा में 12 मई को मतदान जरूर करें।

पन्ना प्रमुख को इन मतदाताओं को पीएम और सीएम की नीतियां व विकास कार्यों का हवाला देते हुए उन्हें भाजपा से जोड़े रखना था। इसके अलावा भाजपा के 16 से अधिक इकाइयां ऐसी थी जो विधानसभा से लेकर लोकसभा हलकों तक पूरी सुनियोजित ढंग से इस चुनावी प्रबंधन में लगी हुई थी। संगठन की इसी मैनेजमेंट का नतीजा 23 मई को सामने आ गया। जिसमें भाजपा सभी दस सीटें जीत गईं।

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