डॉ. अश्विनी शास्त्री
वर्तमान सप्ताह का शुभारंभ आषाढ़ के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि और मासिक शिवरात्रि के साथ हो रहा है। वर्तमान आषाढ़ कृष्ण पक्ष दो दिन बाद ही यानी कल 2 जुलाई को समाप्त हो जाएगा और उसके बाद आषाढ़ का शुक्ल पक्ष आरंभ हो जाएगा। विक्रमी संवत् 2076 में कुल दो सूर्य ग्रहण और एक चंद्र ग्रहण का संयोग है। इनमें से पहला ग्रहण यानी सूर्य ग्रहण इसी सप्ताह के आरंभ में यानी 2/3 जुलाई को घटित होगा। यह सूर्यग्रहण खग्रास ग्रहण है, लेकिन जिस समय यह घटित हो रहा होगा, उस समय अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पूरे भारत में कहीं भी दृश्य नहीं होगा। चूंकि यह भारत में कहीं दिखाई ही नहीं देगा, तो इसलिए इसके सूतक का प्रभाव भी भारत के किसी भी नागरिक पर नहीं होगा। इसलिए हम इस पर कोई चर्चा नहीं करेंगे। इस सप्ताह मासिक शिवरात्रि व्रत, भौमवती अमावस्या, श्री जगन्नाथ रथ यात्रा वगैरह का आयोजन किया जाएगा।

1/3मासिक शिवरात्रि व्रत (1 जुलाई, सोमवार)

प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के दिन शिवरात्रि का व्रत रखने का विधान है। इस दिन भगवान शिव को समर्पित यह व्रत सब प्रकार की मनोकामनाओं को पूरा करने वाला बताया गया है। संपूर्ण शास्त्रों और अनेक प्रकार के धर्मों के आचार्यों ने इस शिवरात्रि व्रत को सबसे उत्तम बताया है। इस व्रत से उपासक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। व्रत रखने वाले उपासक को यह व्रत प्रात: काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यंत तक करना चाहिए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करनी चाहिए और ‘ओम् नम: शिवाय’ का जप करते रहना चाहिए।

जुलाई के व्रत त्योहार: जानें भौमवती अमावस्या से लेकर सावन सोमवार का महत्व

2/3भौमवती अमावस्या (2 जुलाई, मंगलवार)

अमावस्या तिथि प्रत्येक मास में एक बार आती है। चंद्रमास के दो पक्ष ही होते हैं। एक कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष। अगर अमावस्या सोमवार को पड़ रही हो तो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है और मंगलवार को पड़ रही हो तो उसे भौमवती अमावस्या के नाम से अभिहित किया जाता है। अमावस्या को शास्त्रों में दान, तर्पण और पवित्र नदियों में स्नान के लिए विशेषरूप से फलदायी बताया गया है। कहा जाता है कि इस दिन दान करने से पितर और देवता प्रसन्न होते हैं और उपासक को उनकी कृपा प्राप्त होती है। ऐसा भी माना जाता है, इस दिन पितरों का तर्पण करने से व्यक्ति को ऋण वगैरह से मुक्ति मिलती है।

केवल अमरनाथ गुफा में दिखता है शिव पार्वती का ऐसा दुर्लभ संयोग

3/3श्री जगन्नाथ रथयात्रा (3 जुलाई, बुधवार)

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को पुष्य नक्षत्र में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का आयोजन किया जाता है। ओडिशा के पुरी शहर में इस दिन भव्य मेला लगता है और रथ यात्रा निकाली जाती है। यह वैष्णव धर्मावलंबियों का प्रमुख पर्व है। देश के अन्य कई मंदिरों में भी इस दिन रथयात्रा का आयोजन किया जाता है। इस दिन पुरी में आयोजित विशेष समारोह में भगवान कृष्ण, उनके बड़े भाई बलराम और सुभद्रा की मूर्तियों को एक विशाल रथ में रखकर पूरे शहर में भव्य यात्रा निकाली जाती है। इस रथ को घोड़े नहीं खींचते हैं, बल्कि भगवान जगन्नाथ के हजारों भक्त पूरे देश से आकर खींचते हैं। तीन दिन बाद इन मूर्तियों को फिर से जगन्नाथ मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है। यह परंपरा पिछले सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। इसी दिन भगवान जगन्नाथ के भक्त व्रत रखते हैं और भगवान का महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।