तो इस तरह हमारे विकार ही बंधन का कारण होते हैं, आइए जानें

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तो इस तरह हमारे विकार ही बंधन का कारण होते हैं, आइए जानें

ऋषि पराशर एक सिद्ध योगी थे। एक बार जिस नाव से वह यमुना पार कर रहे थे, उसे मछुआरे धीवर की पुत्री सत्यवती चला रही थी। ऋषि, सत्यवती के रूप और यौवन को देखकर विचलित हो गए। ऋषि ने कन्या सत्यवती से प्यार करने की इच्छा जताई। सत्यवती ने कहा कि मैं अनैतिक संबंध से संतान पैदा नहीं करुंगी, लेकिन ऋषि पराशर नहीं माने और उससे प्रणय निवेदन करने लगे।

अब सत्यवती ने तीन शर्तें रखीं। पहली- कि उन्हें ऐसा करते हुए कोई न देखे। ऋषि पराशर ने तुरंत एक काले बादल से नाव के चारों और अंधेरा कर दिया। दूसरी शर्त कि उनकी कौमार्यता भंग न हो। ऋषि ने आश्वासन दिया कि बच्चे के जन्म के बाद उसकी कौमार्यता पहले जैसी ही हो जाएगी। तीसरी शर्त कि उसकी मछली जैसी दुर्गंध एक उत्तम सुगंध में परिवर्तित हो जाए। तब ऋषि ने उसके चारों ओर एक सुगंध का वातावरण बना दिया। इन तीनों शर्तों को पूरा करने के बाद सत्यवती और ऋषि पराशर ने नाव में ही शारीरिक संबंध बनाया। बाद में एक द्वीप पर उनको पुत्र हुआ जिसका नाम कृष्णद्वैपायन रखा। यही पुत्र आगे चलकर महर्षि वेद व्यास नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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नोट: जब चित्त में कोई विकार जोर मारता है, तब सारी तपस्या धरी रह जाती है फिर बड़े से बड़ा सिद्ध भी उसके चक्र में फंस जाता है। अतः अपने विकारों को निरंतर नाश करते जाओ, अन्यथा ये विकार ही बंधन का कारण बने रहेंगे।