दुखों से मुक्ति और पापों के निवारण का केवल यह है एकमात्र उपाय

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निर्मल जैन
रोग को स्वीकार करने, उसका बखान करने में किसी बहादुरी की जरूरत नहीं होती। लेकिन दोष स्वीकार करने में साहस जुटाना पड़ता है। मनोरंजन और गपशप के लिए हम समय सीमा नहीं बांधते, लेकिन प्रवचन सुनने के लिए हमेशा समय कम पड़ जाता है। पिकनिक मनाने या किसी पार्टी में जाने के लिए पल भर में सुसज्जित हो जाते हैं, लेकिन देव-दर्शन हेतु उपयुक्त वस्त्र बदलने में हमें सदैव आलस लगता है।

दरअसल सांसारिक पदार्थों से हमें प्रत्यक्ष सुविधा प्राप्त होती है। इसलिए उनके प्रति हमारी प्रबल आसक्ति बनी रहती है। इनके साथ संबंध जोड़ने से हमें वर्तमान और भविष्य दोनों में लाभ तथा स्वार्थपूर्ति की आशा होती है। यही वजह है कि हम अवसर तलाश कर सांसारिक पदार्थों और व्यक्तियों से अपना तारतम्य स्थापित कर लेते हैं। परंतु प्रभु के साथ मधुर संबंध जोड़ने से हमें कोई तुरंत और प्रत्यक्ष लाभ होता हो, आंखों से ऐसा दिखता नहीं है। शायद इसीलिए प्रभु से जुड़ने को हम वरीयता-क्रम में इन दोनों के बाद ही रखते हैं। इसीलिए हमारा मन प्रभु को ‘प्रियतम’ के स्थान पर तो क्या ‘प्रिय’ के स्थान पर भी स्थापित करने को मुश्किल से ही तैयार होता है।

हम जानते हैं कि प्रभु नाम में ही वह शक्ति समाहित है जो हमारी आत्मा को पवित्र बना सकती है। उसके स्मरण मात्र से ही पाप-कर्म पलायन कर जाते हैं। तब फिर परमात्मा के सिवा किसी अन्य को प्रियतम के स्थान पर कैसे स्थापित कर सकते हैं? हमें शाश्वत सुख चाहिए तो प्रिय के स्थान पर चाहे हम किसी को रखें, लेकिन प्रियतम के स्थान पर प्रभु के सिवाय कोई और नहीं होना चाहिए। न उसकी श्रद्धा में कोई कमी होनी चाहिए। टूटने या कम होने के कितने ही अवसर और निमित्त मिलें फिर भी उसके प्रति ऐसी आस्था बनी रहनी चाहिए जो मेरु पर्वत की तरह अटल हो, जिसे संसार का कोई प्रलोभन या आकर्षण भी चलायमान ना कर सके।

लेकिन हम तो प्रभु को भूल, इच्छाओं और कामनाओं के वशीभूत हो संसार में दौड़ते-भागते जा रहे हैं। इस भाग दौड़ से केवल अशांति एवं असंतुष्टि ही हमारे हाथ लगती रही है। पदार्थ और वस्तु को पाकर, इन्हें अपनी जिंदगी समझ कर हम खुश हो जाते हैं। इस भ्रम में जीना हमें अच्छा लगता है, लेकिन यही भ्रम हमारे कष्टों का कारण बनता है। यह संसार अस्थिर है, किसी को भी कुछ नहीं दे सकता। परमात्मा से विमुख होकर हम जो भी करते या देखते हैं वह सब असत्य है, नाशवान है। इसलिए संसार की रट को छोड़कर प्रभु की ओर बढ़ना होगा। हमें संसार में कुछ संभालना है तो अवश्य ही वस्तु और व्यक्ति को संभालें, लेकिन जीवन न्योछावर करना है तो परमात्मा पर ही करें।

पाप-कर्म का अंत ही दुखों से मुक्ति पाना है और पापों के निवारण का एकमात्र उपाय है प्रभु के पवित्र नाम का भक्ति-भाव से स्मरण करना। इसलिए जीते जी हमें प्रभु चरणों में समर्पण के लिए हर पल तत्पर रहना चाहिए। जिस प्रकार खनिज पदार्थों में हीरा और सोना तथा दूध में घी स्वभाव से विद्यमान है, उसी प्रकार हमारी सबकी आत्मा में प्रभु की विद्यमानता स्वभाविक रूप से होती है। बस जैसे घी पाने के लिए दूध को तपा कर मथते हैं, हीरे को तराशते हैं, खनिज में से स्वर्ण खोजते हैं वैसे ही हमें चिंतन, मनन और आत्म-मंथन कर अपने ह्रदय में बसे प्रभु को खोज निकालना है।

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