madam-curie

संकलन : दीनदयाल मुरारका

प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैडम क्यूरी को भौतिक शास्त्र पर संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार मिला था। पुरस्कार मिलने के बाद उनकी ख्याति चारों ओर फैल गई थी। अब हर तरह के लोग उनसे मिलने और उनके बारे में जानने को उत्सुक रहते थे। लेकिन मैडम क्यूरी की इन बातों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वह अपनी उपलब्धि और प्रसिद्धि से बेखबर रहती थीं। उनके रहन-सहन और स्वभाव में कोई तब्दीली नहीं आई थी। उन्हें बस अपने काम से मतलब रहता था। वह दिन-रात अध्ययन और शोध में लगी रहती थीं। ना तो खाने की सुध रहती थी और ना पहनने, ओढ़ने की।

एक बार उनकी जीवन शैली से अनजान नामी अखबार का एक संवाददाता उनका साक्षात्कार लेने उनके घर पहुंचा। बाहर बैठी मैडम क्यूरी को उसने घर की नौकरानी समझा। सो थोड़े तल्ख अंदाज में पूछा- क्या आप मैडम क्यूरी की नौकरानी हैं? मैडम क्यूरी ने कहा, ‘जी हां , कहिए क्या बात है?’ संवाददाता ने पूछा- क्या घर की मालकिन अंदर घर में है? मैडम क्यूरी ने कहा- ‘नहीं, वह बाहर गई हैं।’ ‘क्या वह जल्दी लौटेंगी?’ मैडम क्यूरी ने कहा- नहीं, वह जल्दी नहीं लौटेंगी।

जवाब सुनकर संवाददाता वहां से जाने लगा। तभी उसे कुछ याद आया। उसने रुक कर पूछा- क्या आपको मैडम क्यूरी कुछ कह कर गई हैं? मैडम क्यूरी ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘हां , उन्होंने कहा है कि अगर कोई उनसे मिलने आए तो बता देना कि लोगों को उनकी वेशभूषा से नहीं बल्कि उनके विचारों एवं कार्यों से पहचानना चाहिए।’ यह सुनकर संवाददाता चौंक उठा। उसे जवाब थोड़ा अटपटा लगा, लेकिन जल्दी ही पूरा माजरा समझ में आ गया। उसने तुरंत माफी मांगते हुए कहा, ‘मैडम मैं बहुत शर्मिंदा हूं। सचमुच मुझसे बड़ी गलती हुई है। लेकिन मैंने इससे सीख ली है और आगे से किसी भी व्यक्ति का आकलन उसकी वेशभूषा के आधार पर नहीं करूंगा।’

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