नई दिल्ली

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्वीट कर अपने भारतीय समकक्ष पीएम नरेंद्र मोदी का ट्वीट कर शुक्रिया अदा किया। भारत ने अपने अब तक के रुख में बदलाव कर इजरायल के समर्थन में वोट किया। संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद में इजरायल के एक प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया है। प्रस्ताव में फिलिस्तीन के एक गैर-सरकारी संगठन ‘शहीद’ को सलाहकार का दर्जा दिए जाने पर आपत्ति जताई गई थी। भारत और इजरायल के बदलते संबंधों और समीकरणों में पिछले कुछ वक्त में दिलचस्प बदलाव आया है।

अविश्वास से शुरु हुए दोनों देशों के रिश्ते

इजरायल और स्वतंत्र भारत का उदय एक ही वर्ष 1947 में हुआ था। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इजरायल को स्वतंत्रता 1948 में मिली। दोनों देशों के शुरुआती संबंध अच्छे नहीं थे। 1947 में ही भारत ने इजरायल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने के विरोध में वोट किया था। इसी तरह से 1949 में एक बार फिर भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल को सदस्य देश बनाने के विरोध में वोट किया था। इजरायल के उदय के साथ शुरुआती 2 साल में भारत का पक्ष हमेशा इजरायल के खिलाफ ही रहा।

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50 के दशक में भारत का रुख इजरायल के लिए बदला

1950 में पहली बार भारत ने बतौर स्वतंत्र राष्ट्र इजरायल को मान्यता दी थी। इसके साथ ही भारत ने इजरायल का काउंसल को मुंबई में एक स्थानीय यहूदी कॉलोनी में 1951 में नियुक्त किया था। इसे 1953 में अपग्रेड कर काउंसलेट का दर्जा दिया। 1956 में इजरायल के विदेश मंत्री मोशे शेरेट ने भारत का दौरा स्वेज नहर को लेकर जारी विवाद के बीच किया था। स्वेज नहर का विवाद मिस्र और इजरायल के बीच था।


चीन युद्ध के दौरान दोनों देशों के बीच गुप्त भाईचारा


1962 के चीन युद्ध के दौरान इजरायल ने पुरानी घटनाओं को एक सिरे से भुलाकर भारत की हथियारों और दूसरे युद्ध साधनों से मदद की थी। उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने इजरायली समकक्ष से पत्र लिखकर मदद मांगी थी। इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेन गुरियन ने हथियारों से भरे जहाज को भारत रवाना कर पत्र का उत्तर दिया। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर दोनों देशों ने एक-दूसरे से दूरी ही बरती क्योंकि तेल अवीव की निकटता वॉशिंगटन से हमेशा रही। दूसरी तरफ भारत गुट निरपेक्ष राष्ट्र था और 1961 में बनाए गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का संगठन उसूलन सोवियत रूस की तरफ झुका था। हालांकि, भारत के सभी प्रमुख युद्धों में इजरायल ने भरपूर मदद की। 1971 में पाकिस्तान युद्ध और 1999 में करगिल युद्ध में भी इजरायल ने भारत को अत्याधुनिक हथियारों से मदद की। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ने जब भारत की खुफिया एजेंसी रॉ का गठन किया था तब भी इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने काफी मदद की।


90 के दशक में इजरायल के साथ भारत ने द्विपक्षीय संबंध बनाए


1992 में पी वी नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे उस वक्त भारत ने इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए। हालांकि, इस फैसले के पीछे बहुत से वैश्विक कारण भी थे। सोवियत रूस के विघटन और इजरायल और फलस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया के शुरू होना दो प्रमुख कारण थे। इजरायल के साथ भारत के बदलते संबंधों की एक वजह जॉर्डन, सीरिया और लेबनान जैसे अरब मुल्कों ने भी भारत को अपनी रूस और अरब की ओर झुकी विदेश नीति पर सोचने के लिए मजबूर किया। पीएलओ (फलस्तीन की आजादी के लिए संघर्ष करनेवाली संस्था) के प्रमुख यासिर अराफात के व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा गांधी से अच्छे संबंध थे और कहा जाता है कि मुस्लिम वोटों के लिए वह इंदिरा के साथ रैली करने को भी तत्पर रहते थे।

पीएम मोदी के नेतृत्व में इजरायल के साथ बदले भारत के संबंध

इजरायल और भारत के बीच बदले संबंधों की असली कहानी सार्वजनिक तौर पर 2015 से नजर आने लगी। संयुक्त राष्ट्र में इजरायल में मानवाधिकार अधिकारों के हनन संबंधी वोट प्रस्ताव के वक्त भारत गैर-मौजूद रहा। इसके बाद ही किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा इजरायल में 2017 में हुआ और पीएम नरेंद्र मोदी ने 3 दिनों का इजरायल दौरा किया। 2018 में बेंजामिन नेतन्याहू ने 6 दिनों का भारत का विस्तृत दौरा किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता संबंधी प्रस्ताव के विरोध में वोट किया।

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